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उत्तराखंड पहुंचे ISRO के पूर्व अध्यक्ष, प्राकृतिक आपदाओं से निपटने का बताया जरिया, जानिये क्या कहा


इसरो पूर्व अध्यक्ष एस सोमनाथ (ETV Bharat)

रोहित कुमार सोनी की रिपोर्ट

देहरादून: उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का राष्ट्रीय अधिवेशन चल रहा है. इसके शुभारंभ कार्यक्रम में इसरो के पूर्व अध्यक्ष डॉ एस सोमनाथ बतौर मुख्य अतिथि शामिल हुए. एबीवीपी के 71वें राष्ट्रीय अधिवेशन के शुभारंभ कार्यक्रम के दौरान इसरो के पूर्व अध्यक्ष ने युवाओं को देश निर्माण और नवाचार का संदेश दिया. उन्होंने कहा युवा पीढ़ी को ज्ञान और तकनीकी से परिवर्तन लाना होगा. डॉ एस सोमनाथ ने कहा भारत आज पूरे आत्मविश्वास से आगे बढ़ रहा है. ऐसे में युवा शक्ति के संकल्प से साल 2047 तक भारत विकसित राष्ट्र बनेगा. विज्ञान प्रौद्योगिकी और संस्कारों के साथ भारत विश्व गुरु भी बनेगा.

ईटीवी भारत से एक्सक्लूसिव बातचीत करते हुए इसरो के पूर्व अध्यक्ष डॉ एस सोमनाथ ने बताया कि, उपग्रहों से ऑब्जरवेशन करने संबंधित डेटा बहुत सारे जगहों पर इस्तेमाल किया जाता है. मुख्य रूप से उपग्रह से धरती का ऑब्जरवेशन किया जाता है. साथ ही यूनिवर्स का भी ऑब्जरवेशन किया जाता है. इस ऑब्जरवेशन का डेटा मुख्य रूप से रिसोर्स मैपिंग, क्लाइमेट चेंज, सर्कुलर इकॉनम, स्ट्रैटेजिक यूज, एजुकेशन कम्युनिकेशन में इस्तेमाल किया जाता है. जब उपग्रह के जरिए यूनिवर्स को ऑब्जर्व किया जाता है तो उसे दौरान यूनिवर्स से संबंधित तमाम जानकारियां मिलती हैं. इसमें यूनिवर्स का इवोल्यूशन क्या है, कल क्या होगा, समेत अन्य जानकारियां इससे मिलती हैं.

इसरो पूर्व अध्यक्ष एस सोमनाथ (ETV Bharat)

इसरो के पूर्व अध्यक्ष डॉ एस सोमनाथ ने बताया भू-स्थानिक डेटा (Geo Spatial Data) में तमाम तरह के डेटा शामिल होते हैं, जिसमें ऑप्टिकल डाटा, रडार डाटा, थर्मल डाटा शामिल है. इसरो ने हाल ही में एक निसार (NISAR) उपग्रह भेजा है. यह डुएल बंद रडार उपग्रह है, जिससे धरती की एक विस्तृत पिक्चर मिलेगी. इससे 12 दिन में धरती का एक तस्वीर मिलेगी. इस पिक्चर के जरिए धरती का टेक्टोनिक मूवमेंट, वॉटर स्ट्रेसिंग और क्लाइमेट चेंज से संबंधित तमाम डाटा मिलता है.

इन सभी डेटा को एनालाइज करने का तरीका भी अपना ही है. जितना डेटा उपग्रह से मिलता है उन सभी डेटा को एआई समेत एंड टूल्स के जरिए आसानी से अध्ययन कर जानकारी निकाली जाती है. जिसमें मुख्य रूप से क्लाइमेट चेंज से उबरने के लिए क्या-क्या किया जा सकता है? एग्रीकल्चर के लिए बेहतर तरीका क्या है? किस तरह से क्रॉप चेंज करना है? आपदा की भविष्यवाणी करने के लिए एक अच्छा मॉडल बन सकता है. हालांकि, इसरो AI का भी तमाम जगहों पर इस्तेमाल कर रहा है. जिसमें मुख्य रूप से स्पेस डिजाइन, स्पेस डाटा, स्पेस इंटेलिजेंस शामिल है. इसके लिए तमाम टीमें भी तैनात की गई हैं. जिसके तहत, एआई मॉडल्स (AI models), लैंग्वेज मॉडल्स (language models), डाटा ड्राइवन मॉडल्स (Data driven models) और एजेंटिक मॉडल (Agentic models) का निर्माण किया जा रहा है.

प्राकृतिक आपदा के संबंध में स्पेस के जरिए तमाम काम किया जा सकते हैं. ये सभी काम भविष्यवाणी के रूप में होंगे. उत्तराखंड में तमाम जगहों पर भूस्खलन की घटनाएं होती हैं. इसको लेकर इसरो ने एक मैप भी बनाया है. जिसके जरिए वो संबंधित स्टेशन को वार्निंग भी देते हैं कि किस-किस जगह पर भूस्खलन की संभावना है. इसकी पूरी जानकारी के लिए, बारिश का डाटा, मॉडल, ग्राउंड की जानकारी को शामिल कर ही प्रिडिक्शन किया जा सकता है. ऐसे में सिर्फ स्पेस के डेटा से पूरी जानकारी या कोई भी भविष्यवाणी नहीं की जा सकती है. ऐसे में राज्य सरकारों के साथ मिलकर कई तरह के तमाम प्रोग्राम चलते रहते हैं.

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